कैसा हंगामा...
[blog#5.1]
I wrote this piece some time ago. It came from a place of quiet thinking, not answers. I am sharing it as it was written.
बहुत थे रास्ते लेकिन
चुनना एक ही तो था,
गलतियां कोई कर बैठा
तो है कैसा ये हंगामा
मैं मानता हूं कि
जंग जिन्दगी से थी
पर, जीत मौत ले गई
तो कैसा हंगामा
बहुत ही शांत बैठा था
अपना कब्र में लेकिन
इनको शांति में भी
दिखता है हंगामा
कहानी तूने जो
कल मुझे सुनाई थी,
साबित करने चल निकला
तो कैसा हंगामा
रहा चलते चलते
कोई रुक जाए तो,
मच उठती है आज
मयखाने में हंगामा
सुना है खूब हमने
पर आज देखेंगे
कैसा है तू रब, और
कैसा हंगामा ।।
Nice 🙂
ReplyDeleteNice poem 👍👍
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