ऐ साक़ी ...

[blog#8.1]

Not every end arrives with a noise, some arrives in silent certainty. And when end stands before the self, it does not ask for recognition, it demands surrender.


वक़्त को रियायत देना भूल गया ऐ साक़ी,
अब क़यामत को सजदा कैसे करूँ?

ले आए हो जलज़ला-ए-क़यामत ऐ साक़ी,
बता, उस क़यामत को सजदा कैसे करूँ?

दे चुका हूँ नब्ज़-ए-ज़िंदगी ऐ साक़ी,
अब उस क़यामत को सजदा कैसे करूँ?

बुझाने आया है वो शमा-ए-ज़िंदगी ऐ साक़ी,
फिर उस क़यामत को सजदा कैसे करूँ?

निहायत ही मज़ाक करते हो ऐ साक़ी,
माना वो क़यामत है, क़यामत ही सही
पर मैं उस क़यामत को सजदा कैसे करूँ?


Comments

  1. बहुत बहुत सुंदर.....लिखते रहिए

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  2. उस क़यामत को सज्दा सीना तान - कर,
    सर उठाकर कर ऐ साक़ी,
    कि भले ही बुझ रही हो ये शमा-ए-ज़िंदगी, मगर एक उम्मीद तो जगे।

    कुछ नए जज़्बात तो उभरें,
    उस गुज़रते हुए लम्हे में,
    कुछ नए लम्हात तो ठहरें।

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    Replies
    1. वो सज़दा, सज़दा क्या ऐ साक़ी,
      जहां सर झुके ही ना।

      और वो क़यामत, क़यामत ही क्या ऐ साक़ी,
      जो आए... ठहरे... और कायनात की माँग ना करे।

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