ऐ साक़ी ...
[blog#8.1]
Not every end arrives with a noise, some arrives in silent certainty. And when end stands before the self, it does not ask for recognition, it demands surrender.
वक़्त को रियायत देना भूल गया ऐ साक़ी,
अब क़यामत को सजदा कैसे करूँ?
ले आए हो जलज़ला-ए-क़यामत ऐ साक़ी,
बता, उस क़यामत को सजदा कैसे करूँ?
दे चुका हूँ नब्ज़-ए-ज़िंदगी ऐ साक़ी,
अब उस क़यामत को सजदा कैसे करूँ?
बुझाने आया है वो शमा-ए-ज़िंदगी ऐ साक़ी,
फिर उस क़यामत को सजदा कैसे करूँ?
निहायत ही मज़ाक करते हो ऐ साक़ी,
माना वो क़यामत है, क़यामत ही सही
पर मैं उस क़यामत को सजदा कैसे करूँ?
Nice
ReplyDeleteThank you... Glad you appreciate it... !!!
Deleteबहुत बहुत सुंदर.....लिखते रहिए
ReplyDeleteउस क़यामत को सज्दा सीना तान - कर,
ReplyDeleteसर उठाकर कर ऐ साक़ी,
कि भले ही बुझ रही हो ये शमा-ए-ज़िंदगी, मगर एक उम्मीद तो जगे।
कुछ नए जज़्बात तो उभरें,
उस गुज़रते हुए लम्हे में,
कुछ नए लम्हात तो ठहरें।
वो सज़दा, सज़दा क्या ऐ साक़ी,
Deleteजहां सर झुके ही ना।
और वो क़यामत, क़यामत ही क्या ऐ साक़ी,
जो आए... ठहरे... और कायनात की माँग ना करे।
✌️✅✅👏
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